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Pustak Mahal

चक्र एवं कुंडलिनी

चक्र एवं कुंडलिनी

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चक्र वं कुंडलिनी बहुत Ûू-सजय़ विद्या होने के कार.ा इससे संबंधित ज्ञान-ंउचयसाधकों, योÛियों और आचार्यों तक ही सिमटी रही। सामान्य जन तक इसकी पहुंच ही नहीं हो सकी, इसीलि, वे इस सर्व कल्या.ाकारी विद्या से वंचित और अनभिज्ञ रहे।

अतः वि}ान लेखक, प्रशि{ाक ,वं योÛाचार्य ने इस अड़चन को दूर करने के लि, यह पुस्तक लिखी है, ताकि साधार.ा जिज्ञासु भी इस अनूठी विद्या को सम-हजय सकें, इसमें पारंÛत हो सकें तथा अपना व सबका कल्या.ा कर सकें।

कुंडलिनी साधना में संलग्न साधक भी इस पुस्तक को प-सजय़कर बहुत ही व्यावहारिक ढंÛ से=ष्ष् इसे=ष्ष् सीख=ष्ष् ओर=ष्ष् सम=ष्ष्झकर इस पर अमल कर सकेंÛे।

कुंडलिनी जाÛर.ा के बारे में आम लोÛों में जो भ्रांतियां फैली हुई हैं, इसे प-सजय़कर उनका निराकर.ा भी किया जा सकता है। इसमें चक्र ऊर्जा }ारा रोÛों के उपचार, चक्र और कुंडलिनी रहस्य जैसे न, और उपयोÛी विषय भी समाहित कि, Û, हैं। यह पुस्तक वास्तव में सर्व साधार.ा के लि, ,क सरल मार्Ûदर्शिका है।

लेखक के बारे में

रमेशचंद्र शुक्ल योÛ, चक्र, कुंडलिनी, रेकी, प्रा.िाक हीलिंÛ, ,क्युप्रेशर तथा विभिन्न वैकल्पिक चिकित्सा प)तियों के जाने-ंउचयमाने विशेज्ञ हैं। ज्योतिष तथा वास्तुशास्= भी इनके प्रिय विषय हैं। इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से योÛ तथा नेचुरोपैथी में पोस्ट Û्रेजु,ट डिप्लोमा किया है तथा योÛ वेदांत, फाॅरेस्ट ,केडमी में शिवानंद आश्रम, ऋषिकेश में प्रशि{ा.ा कोर्स में भाÛ लेकर प्रथम श्रे.ाी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इन्होंने ओमानंद आश्रम, इंदौर, शांतिकुंज, हरि}ार, विवेकानंद योÛ रिसर्च फाउंडेशन, बंÛलुरू, बिहार स्कूल आॅफ योÛ, मुंÛेर तथा प्रजापति ईश्वरीय विश्वविद्यालय, माउंट आबू के साधना शिविरों में भाÛ लिया। इनकी तंदुरुस्त बु-सजय़ापा, योÛ, प्रा.ाायाम तथा रेकी पर भी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये हिमालय तथा कुछ विदेशी योÛियों के सीधे संपर्क में रहे हैं। इनकी विप’यना तथा अन्य ध्यान प)तियों में सहभाÛिता रही है। चक्र और कुंडलिनी के ये लब्ध प्रतिष्ठित साधक हैं। पैंसठ वर्षीय शुक्ल जी सही अर्थों में उच्च कोटि के आध्यात्मिक पुरुष हैं।ढध्ंÛझ

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